बहुमत की हांडी चढ़ी, अब निर्दलीयों के समर्थन का तड़का, राजस्थान में निकाय चुनाव के बाद शुरू हुआ ‘समर्थन का महाभोज’, कई शहरों में निर्दलीय निर्णायक भूमिका में
संपादक -अब्दुल क़ादिर
जयपुर। राजस्थान में निकाय चुनाव के नतीजे घोषित होने के साथ ही चुनावी राजनीति का पहला अध्याय खत्म हो गया है। जनता ने अपना जनादेश देकर पार्षद चुन दिए, लेकिन अब सत्ता के बोर्ड बनाने को लेकर राजनीतिक गतिविधियां तेज होने लगी हैं। कई निकायों में भाजपा और कांग्रेस बहुमत के आंकड़े से दूर हैं, ऐसे में निर्दलीय पार्षद सत्ता की चाबी बनकर उभरे हैं।
राज्य के 309 शहरी निकायों में घोषित 10,244 वार्ड परिणामों में भाजपा ने 4,179, कांग्रेस ने 3,613 और निर्दलीय प्रत्याशियों ने 2,273 सीटों पर जीत दर्ज की है। इन आंकड़ों से साफ है कि निर्दलीयों की भूमिका को नजरअंदाज करना आसान नहीं होगा।
जोधपुर में सात निर्दलीय तय कर सकते हैं बोर्ड
जोधपुर में भाजपा और कांग्रेस को 44-44 सीटें मिली हैं, जबकि 10 निर्दलीय विजयी हुए हैं। बहुमत का आंकड़ा 51 है। ऐसे में दोनों प्रमुख दलों को बहुमत तक पहुंचने के लिए निर्दलीयों के समर्थन की जरूरत पड़ सकती है। यहां निर्दलीय पार्षद बोर्ड गठन में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।
अजमेर में भी निर्दलीयों पर नजर
अजमेर में कांग्रेस 37, भाजपा 32 और निर्दलीय 11 सीटों पर विजयी रहे हैं। बहुमत के लिए 41 पार्षदों की आवश्यकता है। कांग्रेस बहुमत से चार सीट दूर है, जबकि भाजपा को नौ सदस्यों की जरूरत है। ऐसे में निर्दलीय पार्षदों का समर्थन बोर्ड गठन के समीकरण को पूरी तरह बदल सकता है।
अलवर में 14 निर्दलीय बने निर्णायक
अलवर में भाजपा ने 28, कांग्रेस ने 23 और निर्दलीयों ने 14 सीटें जीती हैं। बहुमत का आंकड़ा 33 है। भाजपा सबसे बड़ी पार्टी होने के बावजूद बहुमत से पांच सीट दूर है। ऐसे में निर्दलीयों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण हो गई है।
भरतपुर और हनुमानगढ़ में निर्दलीयों का दम
भरतपुर में 65 में से 36 सीटें निर्दलीयों के खाते में गई हैं, जबकि बहुमत का आंकड़ा 33 है। यानी यहां निर्दलीय अपने दम पर बोर्ड बनाने की स्थिति में हैं। वहीं हनुमानगढ़ में 60 में से 32 सीटों पर निर्दलीयों ने जीत दर्ज की है और बहुमत का आंकड़ा 31 है।
अब शुरू होगा ‘समर्थन का महाभोज’
चुनाव परिणाम के बाद अब राजनीतिक दल निर्दलीय पार्षदों को अपने पाले में लाने की कोशिश करेंगे। मुलाकातों और बैठकों का दौर शुरू होगा तथा समर्थन को लेकर चर्चाएं तेज होंगी। चुनाव के दौरान जिन निर्दलीयों को बागी या अनुशासनहीन कहा जाता था, वही अब बोर्ड गठन के समय महत्वपूर्ण जनप्रतिनिधि बन जाते हैं।
हालांकि किसी निर्दलीय पार्षद का किसी दल को समर्थन देना अपने आप में खरीद-फरोख्त नहीं माना जा सकता। निर्वाचित पार्षद अपनी राजनीतिक समझ और क्षेत्रीय हितों के आधार पर समर्थन का निर्णय ले सकता है। लेकिन यदि समर्थन के बदले आर्थिक लाभ, पद या अन्य निजी फायदे के आरोप सामने आते हैं तो उनके लिए प्रमाण और कानूनी प्रक्रिया जरूरी होगी।
जनता के जनादेश की असली परीक्षा अब
निकाय चुनाव में जनता अपना फैसला सुना चुकी है। अब राजनीतिक दलों और निर्दलीय पार्षदों की बारी है। सवाल यही है कि निर्दलीय अपनी निर्णायक संख्या का इस्तेमाल शहर के विकास और जनहित के लिए करेंगे या सत्ता के समीकरण में अपनी भूमिका मजबूत करने के लिए।
बहुमत की हांडी चढ़ चुकी है, भाजपा-कांग्रेस के पास अपना-अपना मसाला है और कई निकायों में कुर्सी तक पहुंचने के लिए तड़का निर्दलीयों का ही लगेगा। अब देखना यह है कि कौन किसे साधता है और कौन किसके साथ खड़ा होता है।
- Posted By:- Abdul Qadir || Date:- 15 September 2026
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